Friday, May 7, 2010

मेरी संवेदना



मेरी संवेदना ने मुझे पुकारा .
मेरी संवेदना ने मुझे ललकारा
मुझे खुश देखकर उसे हैरत होती थी ,
और अपनी ख़ुशी पर खुद मुझे फक्र होती थी.
फक्र करना एक फितरत सी बन गयी थी .
फिर मुझे एहसास हुआ मेरी असंवेदनशील संवेदना का राज़ क्या है .
आखिर कुछ दिनों में मैंने ढूँढ निकला,
मुझे नहीं चाहिए थी वो घर, वो बंगला, वो गाड़ी,
मुझे बस चाहिए थी मैं और मेरी संवेदनशील सुकून,
जिसमे जिन्दा रह सके मैं और मेरा जूनून.

9 comments:

  1. very nice poem... u 2 can become like H R Bachchan, .....

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  2. Nice poem....

    And the last line is ?????(short of words to describe it)

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  3. I hve 2 salute ur thoughts...

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  4. Is it u....how wrote all these...GR8..!!!

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  5. bhut mast poem hai.touches the heart ..nice one

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  6. Yes money is not every thing...sukun bhi chahiye:)

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  7. Jiska man chanchal hota hai wo khud bhi khus rahta hai aur doosron ko khus rakhta hai....

    keep it up very nice.

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